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घर बनाने से पहले, घर बनाना होता है


घर बनाने से पहले, घर बनाना होता है
घर केवल
ईंटों से नहीं बनता,
और रिश्ते केवल
नामों से नहीं बनते।
घर बनाने से पहले
घर बनाना होता है।
क्योंकि हर इंसान
अपने भीतर एक ऐसी दुनिया लेकर चलता है
जिसे बाहर से पूरा देख पाना
किसी के लिए संभव नहीं।
किसी की एक गलती दिख जाती है,
लेकिन उसके पीछे छिपी
सौ कोशिशें नहीं दिखतीं।
किसी की एक आदत दिखाई देती है,
लेकिन वह आदत क्यों बनी,
यह जानने की कोशिश
शायद ही कोई करता है।
हम अक्सर चाहते हैं
कि दूसरा इंसान हमें समझे,
लेकिन यह भूल जाते हैं
कि समझने से पहले
सुनना पड़ता है।
हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं,
हर गलती पर फैसला देना जरूरी नहीं,
और हर अंतर को
विरोध समझना भी जरूरी नहीं।
क्योंकि शायद
हर कमी को सुधारना भी जरूरी नहीं होता।
कुछ कमियों को
स्वीकार करके भी
जिंदगी आगे बढ़ सकती है।
आखिर हर चीज़
पूर्ण कहाँ होती है?
अगर हर अधूरी चीज़ को
हम दोष देने लगें,
हर imperfect चीज़ को
गलत ठहराने लगें,
तो शायद दुनिया में
स्वीकार करने के लिए
कुछ बचेगा ही नहीं।
एक पेड़ की हर शाखा
एक जैसी नहीं होती,
फिर भी वह पेड़ होता है।
हर इंसान की हर आदत
एक जैसी नहीं होती,
फिर भी वह इंसान होता है।
शायद रिश्तों का अर्थ ही यही है—
जहाँ हर चीज़ perfect होने की शर्त पर
किसी को अपना न बनाया जाए।
कभी-कभी
किसी को बदलने से ज्यादा जरूरी होता है
उसे समझना।
और कभी समझने से भी आगे
एक शब्द आता है—
स्वीकृति।
यह कहना कि—
“हाँ, यह इसका एक हिस्सा है।”
न इसे सही कहना,
न गलत साबित करना।
बस इतना स्वीकार करना
कि इंसान
अपनी अच्छाइयों और कमियों
दोनों से मिलकर बना है।
जैसे हम चाहते हैं
कि हमारे साथ रहने वाले लोग
हमें हमारी कमियों के साथ स्वीकार करें,
शायद वैसे ही
हमें भी दूसरों को
उनकी अपूर्णताओं के साथ
जगह देना सीखना चाहिए।
क्योंकि निजता का अर्थ
दूरी नहीं होता।
खामोशी का अर्थ
घमंड नहीं होता।
अलग सोच का अर्थ
अपनों से नफरत नहीं होता।
और गलती का अर्थ
इंसान का अंत नहीं होता।
हर इंसान को
थोड़ी जगह चाहिए—
अपने विचारों के लिए,
अपनी गलतियों के लिए,
अपने सपनों के लिए,
और कभी-कभी
सिर्फ कुछ पल
बिना किसी सवाल के रहने के लिए।
हम अक्सर
दूसरों की कमियाँ गिनते-गिनते
यह भूल जाते हैं
कि हर इंसान
अपने भीतर कोई न कोई
अनकही लड़ाई लड़ रहा है।
किसी को देखकर
यह मत सोचिए कि—
“यह ऐसा क्यों है?”
कभी यह सोचकर देखिए—
“पता नहीं,
इसके भीतर क्या चल रहा होगा।”
और शायद
उसके बाद
कुछ बदलने की जरूरत ही न पड़े।
शायद सिर्फ
थोड़ी-सी स्वीकृति काफी हो।
क्योंकि हर रिश्ते में
हर बात का समाधान नहीं होता।
कुछ बातें
समझी जाती हैं।
कुछ बातें
छोड़ दी जाती हैं।
कुछ बातें
समय के साथ बदलती हैं।
और कुछ बातें
बस स्वीकार कर ली जाती हैं।
यही तो जीवन है।
सब कुछ पूर्ण नहीं होता,
फिर भी जीवन सुंदर हो सकता है।
सब लोग एक जैसे नहीं होते,
फिर भी साथ रहा जा सकता है।
हर इंसान आपकी सोच के अनुसार नहीं होगा,
फिर भी उसे सम्मान दिया जा सकता है।
शायद दुनिया को
और अधिक सही लोगों की नहीं,
और अधिक समझने वाले लोगों की जरूरत है।
क्योंकि सही होना
हर बार रिश्ते नहीं बचाता।
कभी-कभी
स्वीकार कर लेना
रिश्ते को बचा लेता है।
और शायद—
घर बनाने से पहले
घर बनाना होता है।
जहाँ कोई
अपनी अच्छाइयों के साथ स्वीकार हो,
अपनी कमियों के साथ भी
जी सके,
जहाँ हर बात को
सुधारने की कोशिश न हो,
जहाँ हर अपूर्णता को
अपमान न बनाया जाए,
जहाँ किसी को
पूर्ण होने की शर्त पर
अपना न माना जाए।
क्योंकि आखिर में—
घर वह जगह नहीं
जहाँ सब कुछ perfect हो।
घर वह जगह है
जहाँ imperfect होकर भी
इंसान को अपना होने का
अहसास होता है।
By (Samvedansheel ) Ayush ☺️

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