घर बनाने से पहले, घर बनाना होता है घर केवल ईंटों से नहीं बनता, और रिश्ते केवल नामों से नहीं बनते। घर बनाने से पहले घर बनाना होता है। क्योंकि हर इंसान अपने भीतर एक ऐसी दुनिया लेकर चलता है जिसे बाहर से पूरा देख पाना किसी के लिए संभव नहीं। किसी की एक गलती दिख जाती है, लेकिन उसके पीछे छिपी सौ कोशिशें नहीं दिखतीं। किसी की एक आदत दिखाई देती है, लेकिन वह आदत क्यों बनी, यह जानने की कोशिश शायद ही कोई करता है। हम अक्सर चाहते हैं कि दूसरा इंसान हमें समझे, लेकिन यह भूल जाते हैं कि समझने से पहले सुनना पड़ता है। हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं, हर गलती पर फैसला देना जरूरी नहीं, और हर अंतर को विरोध समझना भी जरूरी नहीं। क्योंकि शायद हर कमी को सुधारना भी जरूरी नहीं होता। कुछ कमियों को स्वीकार करके भी जिंदगी आगे बढ़ सकती है। आखिर हर चीज़ पूर्ण कहाँ होती है? अगर हर अधूरी चीज़ को हम दोष देने लगें, हर imperfect चीज़ को गलत ठहराने लगें, तो शायद दुनिया में स्वीकार करने के लिए कुछ बचेगा ही नहीं। एक पेड़ की हर शाखा एक जैसी नहीं होती, फिर भी वह पेड़ होता है। हर इंसान की हर आदत एक जैसी नहीं होती, फिर भी वह इंसान ...
मैं थोड़ा अलग हूँ… हाँ हाँ, सच में। मुझे ज़्यादा रिश्तों के नाम नहीं पता, कौन क्या लगता है… शायद मैं इन चीज़ों में थोड़ा अनजान हूँ। पर हाँ, मुझे इतना ज़रूर पता है कि सामने वाला इंसान कैसा महसूस कर रहा है। उसकी आँखों के पीछे छुपा दर्द, उसकी ख़ामोशी में छुपी तकलीफ़, और भीड़ में भी महसूस होने वाला उसका अकेलापन… मैं शायद रिश्तों के नाम नहीं समझ पाता, लेकिन इंसान को समझने की कोशिश करता हूँ। हाँ, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो किसी के दर्द को देखकर उससे अपने क़दम पीछे कर लेते हैं, अपनी दूरी बढ़ा लेते हैं। शायद उन्हें डर होता है कि कहीं किसी का दर्द उनकी अपनी ज़िंदगी में न उतर आए। पर वे भूल जाते हैं… कि उन्हें कभी एक संवेदनशील इंसान ने पाला था, बड़ा किया था, गिरने पर संभाला था, और जीने की राह दिखाई थी। जिसने उनके दर्द को समझने के लिए कभी किसी रिश्ते के नाम की ज़रूरत नहीं समझी। इसलिए मैं थोड़ा अलग हूँ… मुझे रिश्तों के नाम भले कम पता हों, पर इंसान की तकलीफ़ पहचानना आता है। और शायद मेरे लिए यही सबसे बड़ा रिश्ता है— इंसानियत का। — समवेदनशील आयुष