मैं थोड़ा अलग हूँ…
हाँ हाँ, सच में।
मुझे ज़्यादा रिश्तों के नाम नहीं पता,
कौन क्या लगता है…
शायद मैं इन चीज़ों में थोड़ा अनजान हूँ।
पर हाँ,
मुझे इतना ज़रूर पता है
कि सामने वाला इंसान कैसा महसूस कर रहा है।
उसकी आँखों के पीछे छुपा दर्द,
उसकी ख़ामोशी में छुपी तकलीफ़,
और भीड़ में भी महसूस होने वाला उसका अकेलापन…
मैं शायद रिश्तों के नाम नहीं समझ पाता,
लेकिन इंसान को समझने की कोशिश करता हूँ।
हाँ, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं
जो किसी के दर्द को देखकर
उससे अपने क़दम पीछे कर लेते हैं,
अपनी दूरी बढ़ा लेते हैं।
शायद उन्हें डर होता है
कि कहीं किसी का दर्द
उनकी अपनी ज़िंदगी में न उतर आए।
पर वे भूल जाते हैं…
कि उन्हें कभी
एक संवेदनशील इंसान ने पाला था,
बड़ा किया था,
गिरने पर संभाला था,
और जीने की राह दिखाई थी।
जिसने उनके दर्द को समझने के लिए
कभी किसी रिश्ते के नाम की ज़रूरत नहीं समझी।
इसलिए मैं थोड़ा अलग हूँ…
मुझे रिश्तों के नाम भले कम पता हों,
पर इंसान की तकलीफ़ पहचानना आता है।
और शायद मेरे लिए
यही सबसे बड़ा रिश्ता है—
इंसानियत का।
— समवेदनशील आयुष

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